नाविक के मामले में दोहरी आवृत्ति (एस और एल बैंड) की देरी में अंतर को मापा जा सकता है, ये जीपीएस से अधिक सटीक है
1999 कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी सैनिक घुसपैठियों की तरह कश्मीर में घुस आए और उन्होंने कारगिल में कई पहाड़ियों पर कब्जा जमा लिया। भारतीय सेना ने मिशन की शुरूआत की, घुसपैठियों की सही लोकेशन पता करने में उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। इसलिए भारत सरकार ने अमेरिका से जीपीएस सिस्टम से लोकेशन उपलब्ध करवाने की मदद मांगी, लेकिन अमेरिका ने ऐसा करने से मना कर दिया। यही वो समय था जब भारत ने अपनी नैविगेशन प्रणाली बनाने पर काम शुरू किया और आज उसी का नतीजा है कि भारत अपनी नैविगेशन प्रणाली बनाने वाले चंद देशों में शामिल है।
7 सेटेलाइटों का समूह ‘नाविक’ यानी नैविगेशन विद इंडियन कौन्स्टेलेशन अब पूरी तरह से तैयार है। 2018 के अंत तक इसको सभी के लिए लॉन्च किया जाएगा। मतलब अब गूगल मैप/जीपीएस के दिन लद गए, यह स्वदेशी प्रणाली "आरपीएस" (रीजनल पोजिशनिंग सिस्टम) लेगा।
आइए जानते है इसकी कुछ खास बातें-
भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (Indian Regional Navigational Satellite System) अथवा इंडियन रीजनल नैविगेशन सैटेलाइट सिस्टम- आईआरएनएसएस भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा विकसित, एक क्षेत्रीय स्वायत्त उपग्रह नौवहन प्रणाली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका नाम भारत के मछुवारों को समर्पित करते हुए “नाविक” (NAVIC) रखा है।
इसका उद्देश्य देश तथा देश की सीमा से 1500 किलोमीटर की दूरी तक के हिस्से में इसके उपयोगकर्ता को सटीक स्थिति की सूचना देना है। सात उपग्रहों वाली इस प्रणाली में चार उपग्रह ही निर्गत कार्य करने में सक्षम हैं लेकिन तीन अन्य उपग्रह इसकी द्वारा जुटाई गई जानकारियों को और सटीक बनायेगें। हर उपग्रह की कीमत करीब 150 करोड़ रुपए के करीब है। वहीं पीएसएलवी-एक्सएल प्रक्षेपण यान की लागत 130 करोड़ रुपए है।
| नाविक ( NAVIC ) |
उद्देश्य
नौवहन उपग्रह आईआरएनएसएस के अनुप्रयोगों में नक्शा तैयार करना, जियोडेटिक आंकड़े जुटाना, समय का बिल्कुल सही पता लगाना, चालकों के लिए दृश्य और ध्वनि के जरिये नौवहन की जानकारी, मोबाइल फोनों के साथ एकीकरण, भूभागीय हवाई तथा समुद्री नौवहन तथा यात्रियों तथा लंबी यात्रा करने वालों को भूभागीय नौवहन की जानकारी देना आदि हैं। विभिन्न क्षेत्रों जैसे आपदा प्रबंधन, वाहनों का पता लगाने, समुद्री नौवहन में मदद करना आदि कार्य भी इसके आँकड़े विश्लेषण करने पर पता चलेंगे। इसरो के मुताबिक यह प्रणाली २ तरह से सुविधायें प्रदान करेगी। जनसामान्य के लिये सामान्य नौवहन व स्थिति सेवा व दूसरी प्रतिबंधित या सीमित सेवा जो मुख्यत: भारतीय सेना, भारतीय सरकार के उच्चाधिकारियों व अतिविशिष्ट लोगों व सुरक्षा संस्थानों के लिये होगी। इसके संचालन व रख रखाव के लिये भारत में लगभग १८ केन्द्र बनाये गये हैं।
वीडियो में देखिए -
सटीकता
प्रणाली का उद्देश्य पूरे भारतीय भूमिगत इलाकों में 10 मीटर से बेहतर और हिंद महासागर में 20 मीटर से भी बेहतर और भारत के आस-पास लगभग 1,500 किमी (930 मील) तक फैले क्षेत्र में एक पूर्ण स्थिति सटीकता प्रदान करना है। 2017 में स्पेस एप्लीकेशन सेंटर ने कहा कि “एनएवीआईसी 5 मीटर तक की स्थिति सटीकता वाले सभी उपयोगकर्ताओं को मानक पोजीशनिंग सेवा प्रदान करेगी।” जीपीएस, तुलना के लिए, 20-30 मीटर की स्थिति सटीकता थी। जीपीएस के विपरीत जो केवल एल-बैंड पर निर्भर है, एनएवीआईसी में दोहरी आवृत्ति (एस और एल बैंड) है। जब कम आवृत्ति संकेत वातावरण के माध्यम से यात्रा करता है, तो वायुमंडलीय गड़बड़ी के कारण इसकी वेग बदल जाती है। भारत के मामले में, वास्तविक देरी का आकलन दोहरी आवृत्ति (एस और एल बैंड) की देरी में अंतर को मापकर किया जाता है। इसलिए, आवृत्ति त्रुटि खोजने के लिए Navic किसी भी मॉडल पर निर्भर नहीं है और जीपीएस से अधिक सटीक है।
विश्व मे समान परियोजनाएँ
यह अनुभाग उन परियोजनाओं से सम्बध है जो लगभग समान सेवाएँ देती हैं:
१- जीपीएस (GPS): यह अमेरिकी अंतरिक्ष विज्ञान संस्था नासा द्वारा विकसित ग्लोबल पोजीशनिंग प्रणाली (जीपीएस) है। यह इस तरह की पहली प्रणाली है।
२- ग्लोनास (GLONASS): यह प्रणाली रूस के ग्लोबल ऑर्बिटिंग नैविगेशन सैटेलाइट प्रणाली का संक्षिप्त नाम है इसे कई बार ग्लोनास भी लिखा जाता है।
३- जीएनएसएस (GNSS): यह प्रणाली यूरोपीय देशों द्वारा विकसित यूरोपियन यूनियन्स गैलीलियो का संक्षिप्त रूप है।
४- बेइदोउ सैटेलाइट नैविगेशन सिस्टम: यह चीनी उपग्रह नौवहन प्रणाली का नाम है।
५- कासी-जेनिथ सैटेलाइट सिस्टम: जापान द्वारा उपग्रह नौवहन के लिए तैयार की गई प्रणाली का नाम है।
संक्षेप में जानकारियाँ
📌 7 सैटेलाइट 1500 किमी के क्षेत्र को कवर कर रहे हैं।
📌 इसमें से तीन उपग्रह भू स्थिर कक्षा में और चार भू-तुल्यकाली कक्षा में स्थापित किए गए हैं।
📌 भूस्थिर कक्षा या भूमध्य रेखीय भूस्थिर कक्षा पृथ्वी से 35786 किमी ऊंचाई पर स्थित वह कक्षा है, जहां स्थित उपग्रह पृथ्वी से हमेशा एक ही स्थान पर दिखाई देता है।
📌 नाविक प्रणाली का पहला उपग्रह IRNSS-1a 01 जुलाई 2013 को प्रक्षेपित किया गया।
📌 इस प्रणाली का आखिरी उपग्रह यानी IRNSS-1i 12 अप्रैल, 2018 को PSLV-C41 द्वारा स्थापित किया गया।
📌 युद्ध, आपदा इत्यादि के समय इसका लाभ भारत के मित्र देश भी ले सकेंगे।
📌 यह स्वदेशी नैविगेशन सिस्टम "नाविक" 20 मीटर से भी कम का सटीक डाटा उपलब्ध कराएगा।
📌 इसे भारतीय उपयोगकर्ताओं के साथ-साथ 1500 किमी तक विस्तारित क्षेत्र की सटीक जानकारी देने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
📌 भारत को स्वदेशी नैविगेशन प्रणाली देने वाला नाविक सभी मौसमीय परिस्थितियों में कारगर है।
📌 इस तकनीक के साथ ही भारत विश्व का तीसरा ऐसा देश बन गया है जिसके पास खुद की स्वदेशी नैविगेशन प्रणाली है।
📌 आईआरएनएसएस के केवल 7 उपग्रह भारत और उसके पड़ोसी देशों को कवर कर रहे हैं।
📌 नाविक प्रणाली को जीपीएस से बेहतर माना जा रहा है, इसका एक कारण यह है कि इसमें S और L बैंड की दोहरी आवृत्ति है, जबकि जीपीएस केवल L बैंड पर ही निर्भर है।
📌 नाविक प्रणाली को इस साल के अंत तक मोबाइल फोन के साथ जोड़ा जाएगा।
📌 यह आपदा प्रबंधन, मैपिंग, भूगर्भीय डाटा कैप्चर करने, ड्राइवरों के लिए दृश्य और आवाज नेविगेशन के अलावा वाहन ट्रैकिंग और बेड़े प्रबंधन में भी मददगार साबित होगा।
📌 सैन्य मिशन पर, हथियारों की आवाजाही और मिसाइल छोड़ने या उसे नैविगेट करने में और विमानों की ट्रैकिंग में भी इसका उपयोग किया जाएगा।
📌 7 सैटेलाइट 1500 किमी के क्षेत्र को कवर कर रहे हैं।
📌 इसमें से तीन उपग्रह भू स्थिर कक्षा में और चार भू-तुल्यकाली कक्षा में स्थापित किए गए हैं।
📌 भूस्थिर कक्षा या भूमध्य रेखीय भूस्थिर कक्षा पृथ्वी से 35786 किमी ऊंचाई पर स्थित वह कक्षा है, जहां स्थित उपग्रह पृथ्वी से हमेशा एक ही स्थान पर दिखाई देता है।
📌 नाविक प्रणाली का पहला उपग्रह IRNSS-1a 01 जुलाई 2013 को प्रक्षेपित किया गया।
📌 इस प्रणाली का आखिरी उपग्रह यानी IRNSS-1i 12 अप्रैल, 2018 को PSLV-C41 द्वारा स्थापित किया गया।
📌 युद्ध, आपदा इत्यादि के समय इसका लाभ भारत के मित्र देश भी ले सकेंगे।
📌 यह स्वदेशी नैविगेशन सिस्टम "नाविक" 20 मीटर से भी कम का सटीक डाटा उपलब्ध कराएगा।
📌 इसे भारतीय उपयोगकर्ताओं के साथ-साथ 1500 किमी तक विस्तारित क्षेत्र की सटीक जानकारी देने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
📌 भारत को स्वदेशी नैविगेशन प्रणाली देने वाला नाविक सभी मौसमीय परिस्थितियों में कारगर है।
📌 इस तकनीक के साथ ही भारत विश्व का तीसरा ऐसा देश बन गया है जिसके पास खुद की स्वदेशी नैविगेशन प्रणाली है।
📌 आईआरएनएसएस के केवल 7 उपग्रह भारत और उसके पड़ोसी देशों को कवर कर रहे हैं।
📌 नाविक प्रणाली को जीपीएस से बेहतर माना जा रहा है, इसका एक कारण यह है कि इसमें S और L बैंड की दोहरी आवृत्ति है, जबकि जीपीएस केवल L बैंड पर ही निर्भर है।
📌 नाविक प्रणाली को इस साल के अंत तक मोबाइल फोन के साथ जोड़ा जाएगा।
📌 यह आपदा प्रबंधन, मैपिंग, भूगर्भीय डाटा कैप्चर करने, ड्राइवरों के लिए दृश्य और आवाज नेविगेशन के अलावा वाहन ट्रैकिंग और बेड़े प्रबंधन में भी मददगार साबित होगा।
📌 सैन्य मिशन पर, हथियारों की आवाजाही और मिसाइल छोड़ने या उसे नैविगेट करने में और विमानों की ट्रैकिंग में भी इसका उपयोग किया जाएगा।
भारतीय सेना द्वारा "नाविक" की मदद से कश्मीर में सेंसिटिव इलाकों की डिजिटल मैपिंग की जा रही है, इससे भारतीय सेना को दुर्गम इलाकों की सटीक जानकारी, आतंकियों के लॉन्च पैड, आतंकियों की घुसपैठ पर नाविक की मदद से सटीक लोकेशन प्राप्त कर सकेंगे।
सबसे बड़ी बात नाविक के 6 सैटेलाइट 2014 से अप्रैल 2018 के बीच नरेंद्र मोदी सरकार में इसरो द्वारा स्थापित किए गए है। स्वदेशी जीपीएस सिस्टम का जो सपना अटल बिहारी बाजपेई जी ने देखा उसको नरेंद्र मोदी जी ने 4 वर्षों में पूरा कर दिखाया है।
★★★★★
